पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन : पंडवानी की अमर आवाज़ हुई खामोश, लोककला जगत में शोक की लहर

छत्तीसगढ़ की लोककला और पंडवानी गायन को विश्वभर में पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण सम्मानित लोक कलाकार तीजन बाई का रविवार तड़के निधन हो गया। उन्होंने सुबह लगभग 3:15 बजे रायपुर के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। वे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थीं और उनका उपचार चल रहा था। उनके निधन से छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश के कला जगत में शोक की लहर है।24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव के एक साधारण परिवार में जन्मी तीजन बाई को बचपन से ही महाभारत की कथाएं सुनने और गाने का शौक था। सामाजिक विरोध और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपने जुनून को कभी नहीं छोड़ा। उस दौर में महिलाओं के लिए पंडवानी की कापालिक शैली में प्रस्तुति देना वर्जित माना जाता था, लेकिन तीजन बाई ने इस परंपरा को तोड़ते हुए अपनी दमदार आवाज़, प्रभावशाली अभिनय और अनूठी प्रस्तुति से नई पहचान बनाई।

उन्होंने महाभारत की कथाओं को मंच पर जीवंत कर दिया। उनकी पंडवानी सुनने के लिए गांव-गांव से हजारों लोग उमड़ पड़ते थे। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में उनकी प्रस्तुति का लोगों को बेसब्री से इंतजार रहता था। अपनी अद्भुत कला के दम पर उन्होंने न केवल प्रदेश बल्कि पूरे देश में पहचान बनाई।प्रसिद्धि का यह सफर यहीं नहीं रुका। तीजन बाई ने अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, रूस, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी सहित अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की लोककला का परचम लहराया। उनकी कला को देश-विदेश में खूब सराहा गया और उन्होंने भारतीय लोक संस्कृति को वैश्विक मंच पर नई ऊंचाई दी।भारतीय लोककला में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। इनमें पद्मश्री (1988), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995), पद्म भूषण (2003), नृत्य शिरोमणि सम्मान, संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप तथा पद्म विभूषण (2019) प्रमुख हैं।तीजन बाई का जाना केवल एक महान कलाकार का निधन नहीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा के एक स्वर्णिम अध्याय का अवसान है। उनकी बुलंद आवाज़ भले ही हमेशा के लिए शांत हो गई हो, लेकिन पंडवानी के माध्यम से रची गई उनकी अमर विरासत आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी।
