राजयोग मन को नियंत्रित कर बुद्धि को शक्तिशाली बनाने की साधना है-बीके रामनाथ
ब्रह्माकुमारीज के धार्मिक प्रभाग के समन्वयक बीके रामनाथ ने बताया राजयोग का स्वरूप, साधु-संतों के सम्मेलन के अनुभव भी साझा किए
आरंग। माउंट आबू, राजस्थान स्थित ब्रह्माकुमारीज के मुख्यालय से आए धार्मिक प्रभाग के समन्वयक बीके रामनाथ ने राजयोग, आध्यात्मिक ज्ञान और मन-बुद्धि के संबंध को लेकर विस्तार से विचार साझा किए। उन्होंने बताया कि वे पिछले करीब 50 वर्षों से माउंट आबू में ब्रह्माकुमारीज से जुड़े हुए हैं और वर्ष 1990 से साधु-संतों, महामंडलेश्वरों एवं विभिन्न धार्मिक संतों के सम्मेलनों के आयोजन से भी जुड़े हैं। इन सम्मेलनों में राजयोग एवं आध्यात्मिक ज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर संवाद और प्रश्नोत्तर के माध्यम से चर्चा की जाती है।बीके रामनाथ ने बताया कि वर्तमान में वे आरंग क्षेत्र में भी नियमित रूप से ज्ञान सुनने वाले लोगों के छोटे-छोटे समूहों के साथ संवाद कर रहे हैं। उनका उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि ब्रह्माकुमारीज का राजयोग क्या है और यह स्वामी विवेकानंद तथा पतंजलि द्वारा बताए गए राजयोग की अवधारणाओं से किस प्रकार समझा जा सकता है।उन्होंने कहा कि संसार में समस्याएं बहुत हैं। जीवन का रास्ता दिखाई देता है, लेकिन उसमें अनेक कठिनाइयां, बाधाएं और चुनौतियां भी आती हैं। ऐसे में केवल ज्ञान सुन लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ज्ञान को समझकर जीवन में उतारना आवश्यक है।
‘सुनना और पढ़ना ही पर्याप्त नहीं, समझना जरूरी’
बीके रामनाथ ने कहा कि मनुष्य पढ़ता और सुनता है, लेकिन उस ज्ञान को बुद्धि में धारण करना और व्यवहार में उतारना सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं, बल्कि समझ विकसित करना है।उन्होंने मन, बुद्धि और एकाग्रता की व्याख्या करते हुए कहा कि हम बच्चों से अक्सर कहते हैं कि ध्यान लगाकर सुनो या पढ़ाई में मन लगाओ। अंग्रेजी में इसे ‘कंसन्ट्रेशन ऑफ माइंड’ कहा जाता है। लेकिन वास्तविक प्रश्न यह है कि एकाग्रता कैसे विकसित हो और उसका उपयोग जीवन को बेहतर बनाने में कैसे किया जाए।उनके अनुसार ब्रह्माकुमारीज का राजयोग एकाग्रता विकसित करने और बुद्धि को सकारात्मक एवं शक्तिशाली बनाने की साधना है। जब व्यक्ति किसी बात को ध्यानपूर्वक सुनता है तो उसका प्रभाव बुद्धि में अंकित होता है और वही बुद्धि आगे चलकर उसके कर्मों और व्यवहार को दिशा देती है।
मन पर नियंत्रण के लिए बुद्धि की शक्ति जरूरी
बीके रामनाथ ने कहा कि मन में अनेक प्रकार के विचार आते रहते हैं। कभी क्रोध, कभी लोभ, कभी मोह और कभी अन्य नकारात्मक विचार मनुष्य को प्रभावित करते हैं। ऐसे समय में बुद्धि यह निर्णय करती है कि कौन-सा विचार स्वीकार करना है और किसे रोक देना है।उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार मां अपने बच्चे को समझाती है कि क्या करना है और क्या नहीं करना है, उसी प्रकार मनुष्य की बुद्धि भी उसके मन को सही दिशा दे सकती है। इसलिए राजयोग में मन के साथ-साथ बुद्धि की शक्ति को विकसित करने पर विशेष जोर दिया जाता है।उन्होंने कहा कि गीता में काम और क्रोध को मनुष्य के पतन का कारण बताया गया है। इसलिए केवल धार्मिक ग्रंथ पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके संदेश को समझकर जीवन में उतारना आवश्यक है।
राजयोग में ‘मैं कौन हूं’ की पहचान महत्वपूर्ण
बीके रामनाथ ने बताया कि राजयोग की ध्यान पद्धति में व्यक्ति स्वयं से प्रश्न करता है—‘मैं कौन हूं?’ इसके माध्यम से वह स्वयं को शरीर से अलग एक चेतन आत्मा के रूप में अनुभव करने का अभ्यास करता है।उन्होंने कहा कि ध्यान के दौरान आत्मचिंतन, परमात्मा की स्मृति और अपने मूल गुणों को जागृत करने पर ध्यान दिया जाता है। आत्मा को शांति, पवित्रता, प्रेम, शक्ति और सद्गुणों का स्वरूप समझते हुए जीवन में इन गुणों को धारण करने का प्रयास किया जाता है।उन्होंने इसे आधुनिक तकनीक से जोड़कर समझाया। उनका कहना था कि जैसे मोबाइल फोन में सही नंबर डालने पर संदेश या बातचीत निर्धारित व्यक्ति तक पहुंचती है, उसी प्रकार ध्यान की सही विधि और एकाग्रता के माध्यम से व्यक्ति परमात्मा की स्मृति से स्वयं को जोड़ने का अभ्यास करता है।
‘राजयोग केवल ध्यान नहीं, जीवन जीने की कला है’
उन्होंने कहा कि राजयोग का उद्देश्य केवल कुछ मिनट आंखें बंद करके बैठना नहीं है। इसका उद्देश्य व्यक्ति की सोच, समझ और कर्मों में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। यदि व्यक्ति ज्ञान सुनता है, उसे समझता है और फिर अपने आचरण में उतारता है, तभी आध्यात्मिक शिक्षा सार्थक होती है।उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में अनेक प्रकार की नकारात्मक प्रवृत्तियां होती हैं। आध्यात्मिक ज्ञान और राजयोग के अभ्यास के माध्यम से इन प्रवृत्तियों को पहचानने और उन पर नियंत्रण पाने का प्रयास किया जाता है।बीके रामनाथ ने ब्रह्माकुमारीज की आध्यात्मिक शिक्षा को आत्मा और परमात्मा के संबंध की समझ से जोड़ते हुए कहा कि ईश्वरीय ज्ञान का उद्देश्य मनुष्य को अपने मूल स्वरूप और मूल गुणों की पहचान कराना है। उनके अनुसार यह ज्ञान जीवन में पवित्रता, शांति और सद्गुणों को विकसित करने की प्रेरणा देता है।उन्होंने बताया कि माउंट आबू में धार्मिक प्रभाग के माध्यम से लंबे समय से साधु-संतों और धार्मिक विद्वानों के साथ संवाद एवं सम्मेलन आयोजित किए जाते रहे हैं। इन आयोजनों में विभिन्न आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा के साथ राजयोग की अवधारणा को भी समझाया जाता है।बीके रामनाथ ने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि आध्यात्मिक ज्ञान केवल सुनने तक सीमित न रहे, बल्कि व्यक्ति उसे समझे और अपने व्यवहार में उतारे। पढ़ना, सुनना, समझना और फिर आचरण में लाना—यही ज्ञान को जीवन में सार्थक बनाने की प्रक्रिया है।
विनोद गुप्ता-आरंग



