पटवारियों की हड़ताल से डिजिटल फसल सर्वे ठप-तहसीलदारों पर बढ़ा बोझ-कनिष्ठ प्रशासनिक सेवा संघ ने सीएम से लगाई गुहार
आरंग।छत्तीसगढ़ में पटवारियों की जारी अनिश्चितकालीन हड़ताल और डिजिटल फसल सर्वे में आ रही गंभीर तकनीकी अड़चनों को लेकर प्रशासनिक अमले में चिंता बढ़ गई है। छत्तीसगढ़ कनिष्ठ प्रशासनिक सेवा संघ ने इस संकट के समाधान के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री को एक विस्तृत पत्र सौंपा है। संघ के प्रदेश अध्यक्ष पेखन टोण्ड्रे ने बताया कि पटवारियों की हड़ताल की वजह से डिजिटल क्रॉप सर्वे (DCS), पीवी ऐप के माध्यम से फसल सर्वेक्षण और जियो-कोऑर्डिनेट्स संकलन का कार्य पूरी तरह पटरी से उतर गया है। इसके अलावा पुराने राजस्व नक्शों और धरातल की वास्तविक स्थिति में विसंगतियों, गैर-जियोरेफरेंस्ड खसरों, कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी और सर्वर की खराबी के चलते यह कार्य बेहद जटिल हो चुका है।सर्वेक्षण की प्रगति रिपोर्ट जमीनी हकीकत बयां कर रही है, जहां लाखों खसरों का काम अधर में लटका हुआ है। पीवी ऐप के ताजा आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश के 32.15 लाख से अधिक खसरों में से अब तक महज 26.39 फीसदी काम ही पूरा हो सका है, जबकि 23.67 लाख से ज्यादा खसरे लंबित पड़े हैं। इसी प्रकार डिजिटल क्रॉप धान खसरा पॉलीगोन के मामले में भी 16.24 लाख खसरों में से सिर्फ 34.96 प्रतिशत का ही काम हो पाया है और 10.56 लाख से अधिक खसरों की एंट्री अटकी हुई है।इस बीच पटवारियों की अनुपस्थिति का सीधा असर तहसीलदारों और नायब तहसीलदारों पर पड़ रहा है। उनसे व्यक्तिगत यूजर आईडी के जरिए सीधे मैदानी सर्वे करने और सत्यापन का दबाव बनाया जा रहा है। संघ का कहना है कि इन अधिकारियों के कंधों पर राजस्व न्यायालयों के संचालन, नामांतरण, सीमांकन, बंटवारा और कानून-व्यवस्था जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण दायित्व होते हैं। ऐसे में यदि वे मैदानी सर्वे के कार्यों में उलझेंगे, तो आम जनता से जुड़े नियमित न्यायिक और प्रशासनिक कामकाज ठप होने की नौबत आ जाएगी।संघ ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि पटवारियों की हड़ताल का तत्काल समाधान निकाला जाए ताकि राजस्व का कामकाज पटरी पर लौट सके। साथ ही डिजिटल क्रॉप सर्वे की तकनीकी समस्याओं को दूर करने के लिए प्रशिक्षित सर्वेक्षक, तकनीकी सहयोग और पर्याप्त संसाधन मुहैया कराने की मांग की गई है। इसके अलावा उपलब्ध मानव संसाधन के अनुसार सर्वे की समय-सीमा दोबारा तय करने, तहसीलदारों व नायब तहसीलदारों को मैदानी सर्वे की अनिवार्यता से मुक्त रखकर केवल पर्यवेक्षण तक सीमित रखने और लंबित कार्यों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की अपील की गई है, जिससे किसानों के हित और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों सुरक्षित रह सकें।
विनोद गुप्ता-आरंग



