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    Home»Blog»चारधाम यात्रा वृतांत (भाग–1) यमुनोत्री और गंगोत्री धाम की अविस्मरणीय यात्रा
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    चारधाम यात्रा वृतांत (भाग–1) यमुनोत्री और गंगोत्री धाम की अविस्मरणीय यात्रा

    Rekhraaz SahuBy Rekhraaz SahuJune 10, 20267 Views
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    चारधाम यात्रा वृतांत (भाग–1) यमुनोत्री और गंगोत्री धाम की अविस्मरणीय यात्रा

    यात्रा वृतांत में आप सभी को उत्तराखंड के चार धामों में से दो पवित्र धामों – यमुनोत्री और गंगोत्री – की यात्रा पर लेकर चलता हूँ।सबसे पहले हम हरिद्वार पहुँचे। वहाँ पहुंचकर माता गंगा में स्नान किया और चारधाम यात्रा का स्मरण करते हुए अपनी यात्रा का शुभारंभ किया। हमारी टीम में कुल 12 साथी थे, जो एक-दूसरे पर भरोसा करने वाले, आत्मीय संबंधों से जुड़े और कभी न टूटने वाली दोस्ती के बंधन में बंधे हुए थे।रेलवे स्टेशन से निकलकर हम सीधे हर की पौड़ी पहुँचे और गंगा स्नान किया।

    यहीं से हमारी चारधाम यात्रा शुरू हुई। इस यात्रा-वृतांत के पहले भाग में मैं आपको यमुनोत्री और गंगोत्री धाम के दर्शन कराऊँगा। अगले भाग में बाबा केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम की यात्रा का वर्णन करूँगा।रेलवे स्टेशन से निकलते ही हमने एक ट्रैवल एजेंसी के माध्यम से टूरिस्ट बस की व्यवस्था की और सभी मित्रों के साथ चारधाम यात्रा पर निकल पड़े। शुरुआती लगभग 30 किलोमीटर तक मैदान, आबादी, दुकानें और सामान्य जनजीवन दिखाई देता रहा, लेकिन जैसे ही हम आगे बढ़े, पहाड़ों का सफर शुरू हो गया।धीरे-धीरे मैदान पीछे छूट गए। सड़क किनारे की दुकानें, बड़े-बड़े होर्डिंग, बैनर और पोस्टर गायब होने लगे। उनकी जगह प्रकृति ने ले ली।

    पहाड़ों की ठंडी हवा, शुद्ध ऑक्सीजन, घने पेड़ों की झुरमुट और हरियाली ने ऐसा एहसास कराया कि हम किसी दूसरी ही दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं। हमारी बस लगातार पहाड़ों की ऊँचाइयों की ओर बढ़ रही थी और हम सभी उत्साह से भरे हुए थे।हमारा लक्ष्य शाम तक बड़कोट पहुँचना था, क्योंकि यहीं से चारधामों में प्रथम धाम यमुनोत्री की यात्रा शुरू होती है। बड़कोट पहुँचकर हमने होटल में विश्राम किया। रात को सभी मित्रों ने एक साथ भोजन किया और सुबह का बेसब्री से इंतजार करने लगे।रात लगभग 11 बजे सोने के बाद सुबह 5 बजे उठे और तैयार होकर बस में बैठ गए। बस हमें यमुनोत्री धाम के आधार स्थल तक लेकर पहुँची। पार्किंग में उतरते ही सभी के चेहरे पर उत्साह झलक रहा था, क्योंकि अब आगे लगभग 8 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई करनी थी।

    यमुनोत्री के प्रवेश द्वार तक पहुँचते-पहुँचते हमारी खुशियाँ दोगुनी हो चुकी थीं। यहीं से चारधामों के प्रथम धाम की वास्तविक यात्रा शुरू हुई। पहाड़ों की चढ़ाई आरंभ हुई और हम सभी उत्साह के साथ आगे बढ़ते गए। शुरू के दो किलोमीटर तक तो पता ही नहीं चला कि हम कितनी ऊँचाई चढ़ चुके हैं, लेकिन उसके बाद एहसास हुआ कि वास्तव में पहाड़ पर चढ़ना कितना कठिन होता है।रास्ते भर श्रद्धालु “जय माँ यमुनोत्री” के जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ रहे थे। धीरे-धीरे सात किलोमीटर का सफर तय हो गया और आठवें किलोमीटर पर हमें मंदिर के दर्शन हुए। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की लंबी कतार लगी हुई थी।

    मंदिर के पास पहुँचकर हमने यमुना नदी का उद्गम स्थल देखा। दूर पहाड़ों से कल-कल करती हुई धारा मंदिर के नीचे से बहती हुई निकल रही थी। यमुना का जल अत्यंत ठंडा था, लेकिन स्नान का उत्साह इतना था कि हमने उस ठंडे पानी में भी स्नान किया।वहीं निकट में तप्त कुंड था, जिसमें प्राकृतिक रूप से गर्म पानी निकल रहा था। कुछ लोगों ने ठंडे जल में स्नान किया और कुछ ने गर्म जल में डुबकी लगाई। ऊँचे पहाड़ों की ठंड में गर्म पानी मिलना किसी सौभाग्य से कम नहीं था। सभी ने गर्म जल में स्नान कर अपनी थकान दूर की।इसके बाद हमने माता यमुनोत्री के मंदिर में दर्शन किए और सुख-समृद्धि की कामना की। वहाँ की एक विशेष मान्यता है कि तप्त कुंड में चावल और आलू की पोटली डालने पर वे पक जाते हैं।

    हमने यह दृश्य अपनी आँखों से देखा। इस प्रकार चारधाम के प्रथम धाम यमुनोत्री के दर्शन संपन्न हुए।दर्शन के बाद हम पहाड़ से नीचे उतरने लगे। अब थकान जैसे गायब हो चुकी थी। चारों ओर का प्राकृतिक सौंदर्य, ऊँचे पहाड़, बहते झरने और ठंडी हवाएँ मन को आनंदित कर रही थीं। रास्ते में हमें रायपुर, धमतरी और महासमुंद सहित छत्तीसगढ़ के कई श्रद्धालु मिले। हमारी छत्तीसगढ़ी बोली सुनकर उन्होंने बातचीत शुरू की और देखते ही देखते परिचय मित्रता में बदल गया।बातों-बातों में पता ही नहीं चला कि हम सात किलोमीटर का उतराई वाला सफर पूरा कर चुके हैं।

    नीचे पहुँचकर चाय पी और फिर होटल लौट गए। रात वहीं विश्राम किया और अगली सुबह चारधाम के दूसरे धाम गंगोत्री की यात्रा के लिए निकल पड़े।सुबह 6 बजे सभी साथी तैयार होकर बस में बैठे। लगभग 250 किलोमीटर दूर स्थित गंगोत्री धाम की ओर हमारा सफर शुरू हुआ। रास्ते भर चारों ओर केवल पहाड़ ही पहाड़ दिखाई दे रहे थे।

    बस में सभी मित्र मस्ती कर रहे थे। यात्रा के दौरान विभिन्न व्यू पॉइंट, घाटियाँ और प्राकृतिक दृश्य देखते हुए हम आगे बढ़ते रहे।रास्ते में एक स्थान पर महादेव के दर्शन किए और नाश्ता-पानी कर आगे बढ़े। बस में बैठकर सभी अपने-अपने अनुभव साझा कर रहे थे। हमारे ड्राइवर की बोली और शैली भी हम सबके मनोरंजन का केंद्र बनी रही। उनकी भाषा में खड़ापन था, जबकि हम छत्तीसगढ़ के लोग अपनी मधुर बोली के लिए जाने जाते हैं। लेकिन इन दस दिनों में हम सभी एक परिवार की तरह बन चुके थे।लगभग शाम 7 बजे हम गंगोत्री के निकट पहुँचे।

    होटल में कमरा लिया, भोजन किया और रात लगभग 11 बजे विश्राम के लिए चले गए। लेकिन उसी रात एक अनोखी घटना हुई।करीब 11:30 बजे अचानक सभी के मोबाइल फोन में तेज अलार्म बजने लगा। पहले तो सभी घबरा गए कि आखिर यह क्या हुआ, लेकिन बाद में पता चला कि यह भारी बारिश और तेज हवाओं की चेतावनी का सैटेलाइट अलर्ट था। पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम की गंभीर चेतावनियाँ इस प्रकार सीधे मोबाइल पर प्रसारित की जाती हैं। यह अनुभव हम सभी के लिए बिल्कुल नया था।अगली सुबह हम गंगोत्री धाम के लिए निकल पड़े। रास्ते में दोनों ओर बर्फीली चोटियाँ, ऊँचे पहाड़, झरने और लंबे-लंबे देवदार के पेड़ दिखाई दे रहे थे।

    जैसे-जैसे हम गंगोत्री के निकट पहुँच रहे थे, मन में उत्साह और श्रद्धा बढ़ती जा रही थी।गंगोत्री पहुँचते ही ऐसा महसूस हुआ मानो हम स्वर्ग में आ गए हों। चारों ओर विशाल पहाड़ और उनके बीच बहती माँ गंगा की धारा मन को अद्भुत शांति प्रदान कर रही थी। मौसम अत्यंत ठंडा था, लेकिन गंगा स्नान करना था। हमने साहस जुटाया और गंगा में डुबकी लगाई।

    पानी इतना ठंडा था कि हाथ-पैर सुन्न होने लगे, लेकिन आस्था के आगे सब कुछ छोटा था।स्नान के बाद माता गंगा की पूजा-अर्चना की और मंदिर में दर्शन के लिए पहुँचे।

    जैसे ही मंदिर के दर्शन हुए, सारी थकान दूर हो गई। सभी ने जयकारे लगाए और माता गंगोत्री के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित की। कतार में लगकर सभी ने विधिवत दर्शन किए।

    दर्शन के पश्चात माता गंगा का पवित्र जल लिया, प्रसाद और स्मृति-चिह्न खरीदे तथा आगे की यात्रा के लिए तैयार हो गए।गंगोत्री से लौटते समय हम हरसिल पहुँचे, जहाँ वर्ष 2025 में बादल फटने और भारी बारिश से भारी तबाही हुई थी। आज भी वहाँ क्षतिग्रस्त भवन और उसके निशान दिखाई देते हैं। यहीं हमें जानकारी मिली कि प्रसिद्ध फिल्म राम तेरी गंगा मैली की शूटिंग भी इसी क्षेत्र में हुई थी। सभी ने वहाँ फोटो खिंचवाए और प्रकृति के बीच कुछ यादगार पल बिताए।

    इसके बाद हमारे सामने लगभग 350 किलोमीटर की लंबी यात्रा थी, जो हमें चारधाम के तीसरे पड़ाव बाबा केदारनाथ की ओर लेकर जाने वाली थी।

    अगले भाग में आप सभी को बाबा केदारनाथ धाम की रोमांचक यात्रा, वहाँ के अद्भुत प्राकृतिक दृश्य और दिव्य दर्शन के अनुभव से अवगत कराऊँगा।

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