बरसते पानी में कदमताल-आरंग में निकला RSS का भव्य पथ संचलन, वक्ताओं ने दिया ‘पंच परिवर्तन’ का संदेश
आरंग। विजयादशमी के पावन अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) द्वारा बुधवार को आरंग नगर में भव्य एवं अनुशासित पथ संचलन का आयोजन किया गया।अर्नव तूफान के चलते बरसते पानी के बावजूद स्वयंसेवकों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी और उन्होंने बरसते पानी के बीच कदम से कदम मिलाकर नगर भ्रमण किया।यह संचलन स्थानीय बाबा बागेश्वर नाथ मंदिर से प्रारम्भ होकर अग्रसेन भवन होते नगर के प्रमुख मार्गों से गुजरा। पूरे मार्ग में स्वयंसेवकों का अनुशासन देखते ही बन रहा था। विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा जगह जगह स्वयंसेवको का पुष्प वर्षा कर स्वागत किया गया। संचलन का समापन सरस्वती शिशु मंदिर हाई स्कूल परिसर में हुआ, जहाँ बौद्धिक एवं औपचारिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आरंग थाना प्रभारी नरेश साहू उपस्थित थे तथा अध्यक्षता नगर संघचालक रामु मिर्धा ने किया। मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. तेजराम जलक्षत्री मंचासीन रहे, जबकि कार्यक्रम का सफल संचालन नगर कार्यवाह मुरारी लोधी द्वारा किया गया।मुख्य वक्ता डॉ तेजराम जलक्षत्री ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि विजयादशमी केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि साधना और उपासना का पर्व है। यह अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और अन्याय पर न्याय की शाश्वत विजय का प्रतीक है। उन्होंने कहा, “नागपुर की पावन धरा पर संघ का जो बीज बोया गया था, वह आज भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में एक विशाल वटवृक्ष का आकार ले चुका है।” उन्होंने युवा पीढ़ी से राष्ट्र निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाने और संघ से जुड़कर देश सेवा का संकल्प लेने का आह्वान किया। साथ ही स्वयंसेवकों को अनुशासन, संकल्प और आत्मनिर्भरता के साथ तन-मन-धन से समाज के उत्थान में जुटने की प्रेरणा दी।अपने उद्बोधन में उन्होंने संघ द्वारा प्रतिपादित ‘पंच परिवर्तन’ के आयामों पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र के निर्माण के लिए समाज में इन पांच विषयों का आचरण जरूरी है।पर्यावरण संरक्षण-प्रकृति के संतुलन और संवर्धन के लिए सजग रहना।सामाजिक सद्भाव-समाज से हर प्रकार के भेद-भाव को समाप्त कर समरसता स्थापित करना।नागरिक कर्तव्यबोध-अधिकारों के साथ-साथ अपने नागरिक कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना।कुटुंब प्रबोधन-परिवार में संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों को जीवित रखना।’स्व’ का बोध-अपनी संस्कृति, भाषा और स्वदेशी जीवन मूल्यों पर गर्व करना।उन्होंने अंत में कहा कि इन जीवन मूल्यों को व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर अपनाकर ही समाज में व्यापक और सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। कार्यक्रम के अंत में प्रार्थना के पश्चात आयोजन संपन्न हुआ।
विनोद गुप्ता-आरंग



