पार्षद पति राज खत्म-अब महिला जनप्रतिनिधि को स्वयं सम्हालनी होगी कमान-आदेश जारी
आरंग। छत्तीसगढ़ में महिला जनप्रतिनिधियों के नाम पर उनके पति या परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा निकायों का कामकाज संभालने की व्यवस्था पर सरकार ने सख्ती करते हुए नया आदेश जारी कर दिया है।पंचायतों के बाद अब नगरीय निकायों में भी महिला जनप्रतिनिधियों की जगह उनके पति, बेटे-बेटी, भाई-बहन या अन्य करीबी रिश्तेदारों के जरिए कामकाज चलाने पर रोक लगा दी गई है।सरकार के इस फैसले का मकसद निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को उनके पद की वास्तविक जिम्मेदारी और निर्णय लेने का अधिकार सुनिश्चित करना है।नए प्रावधानों के तहत किसी नगरीय निकाय में निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि के पति या किसी अन्य करीबी पारिवारिक सदस्य को उनका प्रतिनिधि अथवा समन्वयक बनाकर काम नहीं कराया जा सकेगा।नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने इससे जुड़े 2022 के नियमों में संशोधन किया है। अब महिला मेयर, पार्षद या अन्य निर्वाचित प्रतिनिधि की जगह उनके परिवार का कोई सदस्य बैठकों में उनकी जिम्मेदारी नहीं निभा सकेगा।इस बदलाव का सीधा संदेश है कि चुनाव जीतने के बाद महिला जनप्रतिनिधि की जगह उसके पति या परिवार के किसी सदस्य के हाथ में पद की कमान नहीं जा सकेगी।बैठक में उपस्थिति, चर्चा, निर्णय और निकाय से जुड़े कामकाज में महिला प्रतिनिधि की स्वयं भागीदारी जरुरी होगी। स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू होने के बाद कई जगह ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं कि महिला प्रतिनिधि चुनाव तो जीतती हैं, लेकिन उनके निर्वाचित पद की वास्तविक जिम्मेदारी पति या परिवार के किसी पुरुष सदस्य द्वारा निभाई जाती है।इसी व्यवस्था को आम बोलचाल में पार्षद पति या ‘प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व’ (Proxy representation) कहा जाता है। सरकार के नए कदम से अब यह स्पष्ट किया गया है कि महिला के नाम पर मिले निर्वाचित पद को परिवार का कोई दूसरा सदस्य संचालित नहीं कर सकता।नियमों में पति के साथ-साथ पुत्र, पुत्री, भाई, बहन और अन्य करीबी रिश्तेदारों को भी दायरे में रखा गया है।यदि नए नियमों का सख्ती से पालन होता है तो यह कदम स्थानीय लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी को केवल सांकेतिक प्रतिनिधित्व से आगे ले जाकर वास्तविक नेतृत्व में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

विनोद गुप्ता-आरंग



