शिवमहापुराण कथा सत्संग का चौथे दिन-सती चरित्र आज के समाज के लिये प्रेरणा स्रोत–प.प्रेमकिशोर शर्मा

आरंग। रामलीला चौक तूता नया रायपुर में जय माँ शीतला (शाकम्भरी) जस झांकी परिवार, ग्रामवासी एवं मानस मंडली तूता के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित शिवमहापुराण कथा सत्संग के चौथे दिन कथा व्यास पं. प्रेमकिशोर शर्मा द्वारा प्रस्तुत संध्या देवी के रूप में सती चरित्र का मार्मिक वर्णन श्रोताओं के हृदय को स्पर्श कर गया। कथा मंच से जैसे ही सती की अखंड निष्ठा, तप, त्याग और शिव-भक्ति की गाथा प्रवाहित हुई, पांडाल में भाव-विभोर मौन और अश्रुपूरित नेत्रों के साथ श्रद्धा की लहर दौड़ पड़ी।पं. शर्मा ने कथा की शुरुआत सती के आत्मबल और संकल्प से की। उन्होंने बताया कि संध्या देवी के रूप में सती केवल एक रूप नहीं, बल्कि वह चेतना हैं जो स्त्री शक्ति, आत्मसम्मान और ईश्वर-भक्ति का समन्वय प्रस्तुत करती हैं। दक्ष प्रजापति के यज्ञ प्रसंग में सती की अंतर्द्वंद्वपूर्ण पीड़ा, पिता के अभिमान और शिव के अपमान के बीच उनकी अडिग आस्था इन प्रसंगों को कथा वाचक ने अत्यंत करुण और संवेदनशील शब्दों में उकेरा।कथावाचन के दौरान सती के तप, उनकी शिव-प्राप्ति की साधना और अंततः यज्ञ कुंड में आत्मोत्सर्ग की घटना को जब पं. शर्मा ने स्वर, भाव और दृष्टांतों के साथ प्रस्तुत किया, तब श्रोता भावुक हो उठे। उन्होंने सती के इस त्याग को नारी गरिमा, धर्म और सत्य के प्रति अटल निष्ठा का सर्वोच्च उदाहरण बताया। कथा में यह संदेश भी स्पष्ट हुआ कि अहंकार और अपमान से उपजे विवाद अंततः विनाश का कारण बनते हैं, जबकि प्रेम, सम्मान और समर्पण से ही सृष्टि का संतुलन बना रहता है।पं. प्रेमकिशोर शर्मा ने कथा में आगे कहा कि जहाँ आत्मसम्मान, धैर्य और धर्म के मार्ग पर अडिग रहने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। संध्या देवी के भाव में प्रस्तुत यह कथा केवल श्रवण का विषय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर भी है।कथा समापन पर हर-हर महादेव के जयघोष से वातावरण गुंजायमान हो उठा। श्रद्धालुओं ने एक स्वर में कहा कि सती चरित्र की यह भावपूर्ण प्रस्तुति लंबे समय तक स्मृतियों में जीवित रहेगी और शिव-भक्ति की लौ को और प्रज्वलित करेगी।
विनोद गुप्ता-आरंग


