आरंग तथा गांवों में दिनभर गूंजता रहा छेरछेरा माई-कोठी के धान ला हेर-हेरा…

आरंग। आरंग नगर सहित ग्रामीण अंचल लखौली, रीवा कुकरा, संडी, नारा, भानसोज, बरछा, मालिडीह, खौली, करहिडीह, डीघारी, खम्हरिया, टेकारी, कुंडा, पिपरहट्टा, गोढ़ी, बकतरा, नवागांव, सिवनी, जरौद, उमरिया, परसदा, कोटनी, पलौद, धमनी, गुजरा, छाटापार, छतौना, फरफौद, भिलाई, मोखला पंधी, रसनी सहित अन्य गावो में छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा छेरछेरा का पर्व पूरे उत्साह और उमंग के साथ मनाया गया। सुबह से लेकर देर शाम तक गांवों की गलियों में बच्चों की पारंपरिक हाना “छेरछेरा माई, कोठी के धान ला हेर-हेरा” की गूंज देर शाम तक गूंजती रही। इस लोकनाद ने पूरे गांव को एक सूत्र में बांध दिया।सुबह होते ही ग्रामीण बच्चे, युवा और लड़कियां हाथों में थैला लिए टोली बनाकर गली-गली, घर-घर छेरछेरा मांगने निकल पड़े। जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, उत्साह भी बढ़ता गया। घरों के दरवाजों पर पहुंचते ही बच्चों की आवाज से वातावरण आनंदमय हो उठा।ग्रामीणों ने अपनी सामर्थ्य अनुसार धान एवं अन्न का दान किया। बुजुर्गों ने परंपरा का निर्वहन करते हुए बच्चों को आशीर्वाद दिया, वहीं महिलाओं ने लोकसंस्कृति को जीवंत बनाए रखने में सक्रिय सहभागिता निभाई। छेरछेरा के बहाने गांवों में आपसी सहयोग, भाईचारे और समरसता का भाव साफ नजर आया।ग्रामीणों का कहना है कि छेरछेरा केवल दान का पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की परंपरा है। इस दिन अमीर-गरीब का भेद मिट जाता है और सभी समान भाव से अन्नदान करते हैं।दिनभर चले इस लोकपर्व ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आधुनिकता के दौर में भी आरंग शहर तथा ग्रामीण अंचलों में छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और परंपराएं पूरी जीवंतता के साथ सुरक्षित हैं। छेरछेरा की गूंज के साथ आरंग तथा गांवों में उत्सव, उल्लास और सांस्कृतिक चेतना का अद्भुत दृश्य देखने को मिला।
विनोद गुप्ता-आरंग




