खास खबर-गांवों में बदला नववर्ष का मिजाज-आतिशबाजी से दूरी-हिन्दू नववर्ष के परंपरा की ओर लौटता समाज

आरंग। बीते वर्षों में जहां नए साल का स्वागत 31 दिसंबर की रात आतिशबाजी और शोरगुल के साथ होता रहा, वहीं अब ग्रामीण जीवन में उत्सव की परिभाषा बदलती दिखाई दे रही है। इस वर्ष ठंडे मौसम की तरह ही नया साल शांत, सादगीपूर्ण और आत्मचिंतन के माहौल में बीत गया। गांवों की गलियों में न आतिशबाजी की गूंज सुनाई दी, न ही देर रात तक उत्सव का शोर।ग्रामीणों का मानना है कि पाश्चात्य कैलेंडर के नए साल की तुलना में भारतीय परंपराओं से जुड़ा हिन्दू नववर्ष अधिक आत्मीय और जीवन से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि अब चैत्र माह के प्रथम दिन, यानी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, को लेकर चर्चाएं तेज होती जा रही हैं।गांवों में बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक यह चर्चा आम है कि असली नववर्ष वही है, जो प्रकृति के साथ शुरू होता है।चैत्र माह के आगमन के साथ खेतों में नई फसल, पेड़ों पर नई कोपलें और मौसम में बदलाव दिखाई देने लगता है। ग्रामीण जीवन में यह समय नवचेतना, नव संकल्प और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक माना जाता है।ग्रामीण समाज का यह बदलता रुख इस ओर संकेत करता है कि लोग अब दिखावे से दूर होकर संस्कारों से जुड़ने लगे हैं।कुल मिलाकर, गांवों में यह भावना मजबूत हो रही है कि नववर्ष केवल तारीख का बदलाव नहीं, बल्कि जीवनशैली और संस्कृति से जुड़ा उत्सव होना चाहिए और यही भाव अब हिन्दू नववर्ष को लेकर चर्चा के केंद्र में है।
विनोद गुप्ता-आरंग



