कल 03 जनवरी को छेरछेरा पर्व-छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और सामाजिक चेतना का प्रतीक

आरंग। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति और सामाजिक चेतना का प्रतीक छेरछेरा पर्व आज प्रदेश की विशिष्ट पहचान बन चुका है। पौष पूर्णिमा के अवसर पर कल 3 जनवरी को मनाया जाने वाला यह पर्व दान, समानता और सामाजिक समरसता का संदेश देता है। गांव-गांव में सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी अतीत में रही है।छेरछेरा के दिन सुबह से ही बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों की टोलियां घर-घर जाकर “छेरछेरा माई कोठी के धान ला हेरहेरा” का लोकगीत गाते हुए अन्न संग्रह करती हैं। लोग अपनी क्षमता अनुसार धान, व अन्य अन्न का दान करते हैं। किसान अपने खलिहान से नए धान का दान कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं।यह पर्व केवल अन्न संग्रह तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक अन्न पहुंचाने की भावना से जुड़ा है। छेरछेरा सामाजिक भेदभाव को मिटाकर अमीर-गरीब, छोटे-बड़े सभी को एक समान दानदाता और सहभागी बनाता है। कई स्थानों पर एकत्रित अन्न से सामूहिक भोज, भंडारा और जरूरतमंदों की सहायता की जाती है।लोकमान्यता है कि छेरछेरा के दिन किया गया दान कई गुना फल देता है। यही कारण है कि हर घर इस दिन दानघर बन जाता है। बुजुर्ग अपनी लोकपरंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य करते हैं, जिससे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित और सशक्त बनी रहे।आधुनिकता के इस दौर में भी छेरछेरा पर्व का उत्साह कम नहीं हुआ है। शहरी क्षेत्रों में भले ही इसका स्वरूप बदला हो, लेकिन गांवों में आज भी यह पर्व पूरी आत्मीयता और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया जाता है।छेरछेरा पर्व छत्तीसगढ़ की पहचान, अन्नदान की महान परंपरा और सामाजिक एकता का जीवंत उदाहरण बनकर आज भी जन-जन को जोड़ने का कार्य कर रहा है।
विनोद गुप्ता-आरंग



